टीम विश्व कप हारी पर भारतीय महिलाएं जीत गईं

कुलदीप पंवार
ये पढ़कर आप शायद हैरान हो रहे होंगे, लेकिन मेरी नजर में सच में भारतीय महिलाएं फाइनल हारकर भी जीत गईं। वे देश का महिला क्रिकेट में विश्वास जीत गईं। वे स्पांसरों का भरोसा जीत गईं। वे खुद में ये यकीन जीत गईं कि हम कुछ कर सकते हैं।

2005 से मत कीजिए तुलना इस हार की
इस हार की तुलना 2005 की फाइनल वाली हार से मत कीजिए, क्योंकि तब देश नहीं खड़ा था अपनी लाडो के पीछे। तब वो लहर भी नहीं थी, जो अब बनी है। तब छोटी बच्चियां ऐसे नहीं पहचानने लगी थीं महिला क्रिकेटरों को, जैसे अब हरमनप्रीत कौर, मिताली राज या स्मृति मंधाना को पहचानती हैं।

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बदल गए हैं अब दिन महिला क्रिकेट के

दो दिन पहले मैंने एक लेख पढ़ा था कि कैसे नाइकी के शोरूम में टीम इंडिया की जर्सी एक छोटी बच्ची ने पसंद की और उस पर खिलाड़ी का नाम लिखने को कहा। सेल्समैन ने धोनी या कोहली लिखवाने का सुझाव दिया तो बच्ची ने धीमे से जो नाम लिया वो सुनकर स्टोर के सभी कर्मचारी हैरान रह गए। वो नाम था मंधाना। क्या ये बदलाव 2005 का फाइनल ला सका था। जी नहीं, बिल्कुल नहीं।

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पुरुष क्रिकेट से भी तुलना नहीं
कुछ लोग इस फाइनल की हार की तुलना चैंपियंस ट्राॅफी फाइनल में पुरुषों की हार से कर रहे हैं। मैं कहूंगा मत कीजिए। पुरुषों की चैंपियंस ट्राॅफी के मुकाबले महिलाएं फिर भी फाइट करके हारीं। ये बड़े दबाव वाले मैचों के अनुभव की कमी थी, जो ये परिणाम आया। नहीं तो सभी जानते हैं कि 95% मैच में कौन हावी रहा।

Britain Cricket Womens World Cup

अब गेंद बीसीसीआई के पाले में है। इन लड़कियों को ज्यादा मैच खेलने के मौके दे। ज्यादा एक्सपोजर दे तो अगली बार परिणाम बदलेगा। देश में जो माहौल बना है, उसमें तो आईपीएल जैसी लीग भी महिलाओं के लिए फिलहाल कराएंगे तो जमकर स्पांसर भी मिल जाएंगे और दर्शक भी।

Britain Cricket Womens World Cup

हार के बीच ऐसे पाजिटिव रहा फाइनल
विश्व कप फाइनल की सबसे पाजिटिव बात ही मुझे ये लगी कि टीवी प्रसारण में पुरुषों के मैचों की तरह हर ओवर बाद विज्ञापनों की भरमार थी। दुनिया भ्रष्टाचार में 50 मिलियन दर्शकों से ज्यादा, वो भी महिला मैच में। भारत में 80% ज्यादा दर्शक। और क्या उदाहरण चाहिए, देश में महिलाओं के लिए बदले माहौल का। अब जरूरत अंतिम चोट की।

CA XI v India - Tour Match

मानता हूं कि विश्व कप आ जाता तो निश्चित ही वो क्रांति हो जाती महिला क्रिकेट में, जो 1983 ने पुरुषों के लिए की। लेकिन यकीन मानिए, अब भी कम नहीं है। बाजार तैयार है, बस जरूरत थोड़े इन्वेस्टमेंट की है, जो बीसीसीआई को करना चाहिए। इन लड़कियों को मैदान चाहिए, बाकी धूम तो वे खुद ही मचा लेंगी।

(लेखक राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र में खेल संपादक हैं। यदि आपको आगे भी उनके ऐसे लेख पढ़ने हैं तो आप हमारी इस ब्लॉग साइट को FOLLOW कर सकते हैं।)

 

 

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