संन्यास विशेष: सिर्फ क्रिकेटर नहीं क्रिकेट की सबसे बड़ी किताब थे सुनील गावस्कर – Sunil Gavaskar, Not Only A Cricketer, He Was BOOK OF CRICKET

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नई दिल्ली। 17 मार्च ही वो तारीख थी 1987 के साल में, जब क्रिकेट की सबसे बड़ी किताब में आखिरी चैप्टर भी लिख लिया गया। ये किताब थी महान सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर के क्रिकेट करियर की।

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एक ऐसा बल्लेबाज, जिससे वेस्टइंडीज की वो पेस चौकड़ी भी घबराती थी, जिसके सामने पूरी दुनिया के बल्लेबाजों के पैर कांपते थे। आखिर घबराती भी क्यूं नहीं, जब सभी बल्लेबाज खुद को कैरेबियन पेस के सामने हेल्मेट में छिपाने या बल्लेबाजी क्रम में नीचे उतारकर बचने का जुगाड़ तलाशते थे, तब छोटे से कद के गावस्कर ही थे, जो गोल हैट लगाए नई गेंद के सामने नमी से भरी पिचों पर भी आसानी से उन खतरनाक गेंदबाजों को एक के बाद एक शाॅट खेलकर ठेंगा दिखाते रहते थे।

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10000 टेस्ट रन, डेढ़ दशक तक 34 शतक के साथ नंबर वन, ये तो सिर्फ चंद आंकड़े थे, सनी (साथियों में इसी नाम से प्रसिद्ध थे गावस्कर) के करियर में। वो क्या करने वाले हैं इसकी झलक पहली ही टेस्ट सीरीज में वेस्टइंडीज के ही खिलाफ 4 टेस्ट में एक के बाद एक दनादन रन बनाते हुए 774 रन ठोंककर दिखा दी थी उन्होंने। डेब्यू सीरीज का यह रिकॉर्ड आज तक नहीं तोड़ा जा सका है। यही साहस था, जिसने भारत को कैरेबियाई धरती पर पहली बार जीत हासिल करने का जोश दिया।

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एक-एक शाॅट क्रिकेट की किताब में दिए गए तरीकों पर परफेक्शन की कतार में खरा उतरता हुआ, ये खासियत थी सनी की बल्लेबाजी की और शायद यही कारण था कि उन्हें खुद क्रिकेट की चलती-फिरती किताब कहा जाता था। पिच पर फुटवर्क का खूबसूरत अहसास लेना हो तो सनीचर की बल्लेबाजी से बढ़कर शायद कुछ हो ही नहीं सकता था। एक तत्कालीन मशहूर कमेंटेटर ने कहा भी था कि गावस्कर की बल्लेबाजी के बाद पिच को देखिए, फुटवर्क के निशान ऐसे दिखेंगे मानो कोई चिड़िया इधर-उधर फुदकती रही हो।

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गेंदबाज को जवाब कैसे दिया जाए, यह भी सनी बखूबी जानते थे। जहां आज गेंदबाज-बल्लेबाज स्लेजिंग में उलझ जाते हैं वहीं सुनील ने 1983 में भारत आई वेस्टइंडीज के सबसे खौफनाक गेंदबाज मैल्कम मार्शल की गेंद पर बल्ला हाथ से छूट जाने का बदला दनादन चौकों से लिया था।

जिस बल्लेबाज पर अपने पहले वनडे विश्वकप में पहली बार सीमित ओवर मैच खेलने पर 60 ओवर बल्लेबाजी कर सिर्फ 36 नॉटआउट रन बनाने के बाद टेस्ट बल्लेबाज होने का ठप्पा लगा दिया गया हो, उन विशेषज्ञों को भी कैसा करारा जवाब दिया था सनी ने करियर के आखिरी विश्व कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ धुआंधार तरीके से अपना वनडे का एकमात्र शतक लगाते हुए।

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बेंगलूरु में करियर के आखिरी टेस्ट में भी उन्होंने पाकिस्तान की दबावभरी गेंदबाजी के सामने जो 96 रन बनाए थे, उसे उनकी सबसे बेहतरीन पारी में गिना गया। एक बल्लेबाज के लिए इससे बड़ी बात शायद कुछ नहीं हो सकती कि उसके संन्यास लेने पर पूछा जाए कि अभी क्यूं, थोड़े दिन और खेल सकते हैं अभी तो…..लेकिन वो गावस्कर थे, जो हमेशा मिसाल कायम करने के लिए मशहूर रहे।
क्रिकेट पिच छोड़ने के बाद कमेंट्री बाक्स में भी मशहूर होने वाले चंद ही क्रिकेटर रहे हैं और सनी उनमें भी अव्वल हैं। यहां भी ऐसा कि कमेंट्री में की गई आलोचना को गुरु ज्ञान मानकर तवज्जो दी जाए तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं उनकी महानता का।

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