140 साल का हुआ टेस्ट क्रिकेट पर बढ़ रही है अस्तित्व की चिंता

नई दिल्ली। ठीक 140 साल पहले 15 मार्च 1877 वो तारीख थी, जब पहली बार उस ‘महामारी’ को अधिकारिक दर्जा मिला, जिसने लगभग पूरी दुनिया को धीरे-धीरे अपनी चपेट में ले लिया। यह महामारी थी क्रिकेट देखने और खेलने की। भले ही यह कहा जाए कि आज भी दुनिया में फुटबॉल और हॉकी के मुकाबले क्रिकेट खेलने वाले देशों की संख्या कम है, लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि क्रिकेट इस समय तेजी से लोकप्रिय होता खेल है और कई फुटबॉल खेलने वाले देशों में भी इसका क्रेज तेजी से बढ़ाहै।

ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच मेलबर्न में 19 मार्च, 1877 तक चले पहले ऐतिहासिक अधिकारिक टेस्ट मैच में मेजबान ऑस्ट्रेलिया ने 45 रनों से जीत दर्ज की थी। तब से आज तक हर दिन क्रिकेट की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से ऊपर की तरफ ही चढ़ा है। यहां तक कि इसके भी तमाम तरह के नए-नए संस्करण सामने आ गए, जिनके चलते क्रिकेट प्रेमियों को भी अपनी सुविधानुसार इस खेल से जुडऩे का मौका बढ़ता चला गया। लेकिन साथ ही बढ़ती जा रही हैं इस खेल के सबसे पुराने संस्करण यानि टेस्ट क्रिकेट के लिए चुनौतियां भीं। हर मिनट में तेजी से बदल रही दुनिया में युवा पीढ़ी पांचबा दिन तक स्टेडियम में बैठकर टेस्ट मैच देखने का मिजाज खोती जा रही है। इसमें कोढ़ में खाज सरीखे साबित हो रहे हैं बोरियत से भरे ड्रॉ होते टेस्ट मैच। ऐसे में जरूरत महसूस की जा रही है, इस संस्करण को तमाम तरीकों से रोचक बनाने की।

इतना लंबा हो गया है टेस्ट क्रिकेट का सफर
140 साल लंबे टेस्ट क्रिकेट के सफर में इसके दो संस्करण पैदा हुए। पहला वनडे क्रिकेट और दूसरा टी20 क्रिकेट। वनडे क्रिकेट आज 46 साल 2 महीने और 10 दिन का है, जबक टी20 क्रिकेट किसी अबोध बच्चे जैसा 12 साल 26 दिन का। लेकिन जैसा हुआ करता है, हर घर में बूढ़े के मुकाबले बच्चे को प्राथमिकता मिलने की परंपरा क्रिकेट के इन संस्करणों पर भी लागू होती हैं और आज की तारीख में लोकप्रियता के पैमाने पर फटाफट क्रिकेट का सबसे छोटा संस्करण यानि टी20 क्रिकेट अन्य दोनों के लिए खतरा साबित हो रहा है। 2253 टेस्ट मैच के सफर में 3849 वनडे और 601 टी20 मैचों का नजारा क्रिकेट प्रेमी देख चुके हैं। लेकिन दर्शकों की घटती संख्या का नजारा यदि किसी एक संस्करण में दिखाई दे रहा है तो वह है टेस्ट क्रिकेट में और इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, साल दर साल घटती मैचों की संख्या के तौर पर।

असली परीक्षा लेता है टेस्ट क्रिकेट
भले ही कम समय में ज्यादा मजा देने के नाम पर टी20 क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ रही हो और लंबी हिट लगती देखकर गेंदबाजों के माथे पर बहते पसीने को देखकर ही युवा दर्शक खुश होने लगे हों, लेकिन यह नितांत सत्य है कि आज भी किसी बल्लेबाज के टेलेंट का असली पैमाना टेस्ट क्रिकेट ही है। टेस्ट क्रिकेट में पांच दिन के खेल के दौरान ही परखा जा सकता है कि कोई बल्लेबाज कितना बड़ा प्रतिभावान है और किसी गेंदबाज के अंदर गेंदों में चतुराई भरने की कला कितनी कूट-कूट कर भरी है।

Could there be bigger totals in Tests in four years? Have bowlers exhausted all the ways to keep batsmen in check?

आप ही बताइए यदि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया-भारत के बीच खत्म हुए पुणे और बेंगलूरु टेस्ट मैचों को ही पैमाना बनाया जाए तो गेंद और बल्ले के बीच जूझने के रोमांच का ऐसा लुत्फ क्या किसी टी20 मैच में उठाया जा सकता है। यह टेस्ट क्रिकेट में ही संभव है कि स्टीव ओकीफे सरीखे स्पिनर की गेंद मिडिल स्टंप पर ठप्पा खाने के बाद ऐसा घुमाव ले कि सीधी स्लिप में खड़े कप्तान स्टीव स्मिथ के हाथ में पहुंच जाए या फिर नाथन लियोन की गेंद ठप्पा खाने के बाद ऐसा उछाल ले कि चेतेश्वर पुजारा जैसा तकनीक का धनी बल्लेबाज भी चकित होकर फॉरवर्ड शॉटलेग पर खड़े फील्डर के हाथों में कैच थमा दे। आर. अश्विन की हवा में फ्लाइट लेती गेंद पर स्ट्रोक खेलने के प्रयास में चकमा खाकर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज विकेट गंवा दे। तेज गेंदबाजों की पुरानी गेंद से भी उल्टी दिशा में होती लंबी-लंबी रिवर्स स्विंग बल्लेबाज के चेहरे पर वही बदहवासी पैदा कर दे, जो नई गेंद पैदा करती है। आप भी जानते हैं कि ये कमाल किसी भी 20 ओवर के मैच में संभव नहीं है बल्कि पांच दिन तक हर घंटे अपना रंग बदलने वाली पिच पर ही ऐसा नजारा देखने को मिल सकता है।

क्या कभी भूली जा सकती हैं ये पारियां
फटाफट क्रिकेट के दौर में रोजाना लंबी-लंबी हिट से भरी पारियां खेली जाती हैं और चंद दिन की वाहवाही के बाद दर्शक भी उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन टेस्ट क्रिकेट में गेंद-बल्ले की तगड़ी जद्दोजहद के बीच खेली जाने वाली पारियां दशकों तक दर्शकों को ऐसे ही याद रहती हैं, मानो कल खेली गई थीं। इसका कारण है उन पारियों में तकनीक की पराकाष्ठा का दर्शनीय नजारा। डॉन ब्रैडमैन की पारियों के वीडियो आज भी दर्शकों को लुभाते हैं तो गैरी सोबर्स की 365 रन की पारी देखने का आकर्षण भी अनोखा रहता है।

ब्रायन लारा के 401 रन, 375 रन हों या फिर सुनील गावस्कर के अपनी पहली टेस्ट सीरीज में वेस्टइंडीज की आंखें बंद करा देने वाली पेस चौकड़ी की गेंदों पर लगाए गए शतक आज भी अविस्मरणीय कहे जा सकते हैं। इयान बॉथम के एशेज सीरीज में और भारत के खिलाफ दिखाए गए ऑलराउंड प्रदर्शन को भुलाना शायद ही संभव है और इतना ही असंभव है भारत की स्पिन चौकड़ी और उनसे भी पहले वीनू मांकड का अपनी घूमती गेंदों पर बल्लेबाज की आंखों में कैरेबियाई तेज गेंदबाजों की गेंदों की तरह चारों तरफ घिरे करीबी फील्डरों को लेकर दिखता खौफ भूल पाना। शायद ही कोई सचिन तेंदुलकर की 1993 में पर्थ टेस्ट की 114 रन की पारी और 1999 में चेन्नई टेस्ट में पाकिस्तान के खिलाफ 116 रन की पारी भूल पाएगा। कोई भी विशेषज्ञ विरेंदर सहवाग की खौफजदा करने वाली वनडे पारियों से भी पहले हमेशा आपको उनके तिहरे शतकों की बात ही करता दिखाई देगा। सुनील गावस्कर की अंतिम टेस्ट पारी में बेंगलूरु में पाकिस्तान के खिलाफ खेली गई नर्वस नाइंटी को उनके 35 शतकों से भी ज्यादा तवज्जो मिलने का कारण भी टेस्ट क्रिकेट में तकनीक की पराकाष्ठा ही कारण रही होगी।

फटाफट क्रिकेट की होड़ में घटते जा रहे टेस्ट मैच
फटाफट क्रिकेट को लेकर बढ़ते के्रेज के बीच टेस्ट क्रिकेट के आयोजन का नजारा घटता ही जा रहा है। पिछले 10 साल को आधार माना जाए तो इस दौरान जहां सिर्फ 424 टेस्ट मैच आयोजित किए गए, वहीं 1317 वनडे और 587 टी20 मैचों का आयोजन सारी दुनिया में किया गया। इसका कारण प्रायोजकों की घटती रूचि को भी बताया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा कारण है क्रिकेट बोर्डों की कम टेंशन में फटाफट क्रिकेट से ज्यादा कमाई करने की कोशिश। ऐसे में अगले कुछ साल में टेस्ट क्रिकेट सिर्फ परंपरा के लिए एक-आध मैच तक ही सिमटकर ना रह जाए तो भी कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी।

अब कुछ बात दुनिया के पहले टेस्ट मैच की
पहले टेस्ट मैच में कोई समय सीमा नहीं थी, इसमें दोनों टीमों ने दो-दो पारियां खेली। ये टेस्ट मैच चार दिनों तक चला था। पहले के वक्त में यही हुआ करता था, चाहे कितने दिन लगे दोनों टीम को दो-दो पारियां खेलनी होती थी। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान जैक ग्रेगरी ने टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाजी की थी और पहली पारी में 245 रनों का स्कोर खड़ा किया था। इन रनों में अकेले ही ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज बैनरमैन ने 165 रनों की शतकीय पारी खेली थी, जोकि टेस्ट इतिहास का पहला शतक भी था।

बैनरमैन के खाते में ही टेस्ट क्रिकेट का पहला रन बनाने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। इसके अलावा उनके नाम एक और रिकॉर्ड दर्ज है, जो आज तक नहीं तोड़ा जा सका। यह रिकॉर्ड है किसी टीम की पारी में एक बल्लेबाज के सबसे ज्यादा प्रतिशत योगदान का। बैनरमैन की 165 रन की पारी ऑस्ट्रेलिया के पहली पारी के 245 रन के स्कोर का 67.3 त्न था,जो आज तक टेस्ट क्रिकेट में किसी अन्य बल्लेबाज की पारी से नहीं टूटा है।

इसके जवाब में इंग्लैंड पहली पारी में 196 रन पर ही लुढ़क गया। इंग्लैंड की पारी में भी उनके सलामी बल्लेबाज हैरी जुप्प ने 63 रन की पारी खेलते हुए टेस्ट क्रिकेट का पहला अर्धशतक बनाया। दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया की टीम सिर्फ 104 रनों पर सिमट गई। इस तरह इंग्लैंड की टीम के सामने 153 रनों का लक्ष्य था। लेकिन पूरी टीम सिर्फ 108 रन बनाकर आउट हो गई और इस तरह पहले टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया 45 रनों से जीत गई।

इंग्लैंड के गेंदबाज ने फेंकी थी टेस्ट क्रिकेट इतिहास की पहली गेंद
्रइंग्लैंड के मध्यम तेज गति के गेंदबाज अल्फे्रड शॉ ने टेस्ट इतिहास की पहली गेंद फेंकी थी। शॉ ने अपने पहले ही मैच में शानदार गेंदबाजी करते हुए पहली पारी में 3 और दूसरी पारी में 5 विकेट लेकर मैच में कुल 8 विकेट झटके थे। हालांकि टेस्ट क्रिकेट में पहली बार पारी में 5 विकेट लेने का श्रेय अल्फ्रेड शॉ के खाते में नहीं आया बल्कि यह कारनामा इंग्लैंड की पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया के मध्यमतेज गति के गेंदबाज बिली मिडविंटर ने 5 विकेट 78 रन पर चटकाकर किया था। मिडविंटर की खास बात यह थी कि वह ऑस्ट्रेलिया और उसके बाद इंग्लैंड यानि दोनों देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेस्ट क्रिकेट खेले और ऐसा करने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने थे।

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