23 degree Cooled at doha with football match in 50 degree temperature

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Kuldeep Panwar

New Delhi. KHALIFA INTERNATIONAL STADIUM is made for FIFA WORLD CUP-2022 in DOHA was inaugurated for public on Friday with Emir Cup football final. But it’s not a final description.

World’s first fully air-cooled open stadium, made with new cooling technology with help of solar panels, which degraded temperature from 50 degree Celsius to as much below up to 23 degree.

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Instead of used any harmful gas or chemical, Engineers used chilled water pipe net to degrade temperature, worked with solar power.

Special canopy type roof top also a specialty of this project, which help to maintain cool air in desired area.

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It’s a beautiful peace of green work, which needs in our world. kindly think green, go green.

पुण्यतिथि विशेष : देश के पहले असली ऑलराउंडर थे दत्तू फडकर – Dattu Phadkar, First Real Allrounder Of Indian Cricket

नई दिल्ली। 1932 में पहली बार भारत के टेस्ट क्रिकेट संग्राम में उतरने के बाद गुरुवार को भारतीय क्रिकेट टीम रांची में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना 511वां टेस्ट मैच खेलने उतरी। इस दौरान 287 क्रिकेटरों ने देश के लिए टेस्ट कैप पहनने का श्रेय हासिल किया। लेकिन बात आती है, जब ऑलराउंड क्रिकेटरों की तो देश के खाते में सिर्फ 38 खिलाड़ी ऐसे आते हैं, जो 50 या उससे ज्यादा विकेट भी रनों का अंबार लगाने के साथ-साथ अपने खाते में शामिल कर पाए। इन ऑलराउंडरों की सूची में बल्ले और गेंद के बीच औसत के अंतर के हिसाब से दत्तू फडकर 7वें नंबर पर आते हैं। लेकिन 17 मार्च, 1985 को भारतीय क्रिकेटप्रेमियों का साथ छोड़कर दूसरी दुनिया के लिए रवाना हो गए 6 फुट लंबे इस क्रिकेटर की खूबी बस इतनी सी ही नहीं थी।

ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर किया था धमाकेदार आगाज
ऑस्ट्रेलियाई पिचों का नाम सुनते ही जहां दुनिया के बड़े से बड़े बल्लेबाज की आज भी ‘नानी’ कांपती है, यदि किसी बल्लेबाज को उन्हीं पिचों पर अपना अंतरराष्ट्रीय करियर शुरू करना हो तो उसका क्या हाल होगा? दत्तू फडकर ने अपना टेस्ट करियर इन्हीं ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर तब शुरू किया था, जब देश की आजादी के जश्न के खुमार में डूबा हुआ था। भारतीय टीम पहली बार ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर रही थी। ऐसे में इस टीम के पास न तो वहां के विकेटों का मिजाज बताने वाला अपने किसी पुराने क्रिकेटर की सलाह मौजूद थी और न ही वहां के क्रिकेटरों के बारे में बहुत ज्यादा जानते थे।

ऐसी परिस्थितियों के बीच 12 दिसंबर 1947 को सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर अपने टेस्ट करियर का पहला रन उस ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजी के सामने बनाया था, जिसकी अगुआई रे लिंडवाल और कीथ मिलर जैसे खौफनाक तेज गेंदबाजों की जोड़ी कर रही थी। बता दें कि लिंडवाल और मिलर को टेस्ट इतिहास के सर्वश्रेष्ठ तेज गेंदबाजों में गिना जाता है। यह सीरीज का दूसरा टेस्ट मैच था। दत्तू फडकर ने अपने करियर की शुरुआत 51 रन की शानदार अद्र्धशतकीय पारी से की और मैच में 14 रन देकर 3 विकेट भी चटकाए।

विशेषज्ञों ने लिखा था कि फडकर उधेड़ते हैं गेंदबाज की बखिया
उस सीरीज की मैच रिपोर्ट पढ़ी जाएं तो तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट विशेषज्ञों ने इस लंबे-चौड़े ऑलराउंडर की जमकर तारीफ की और लिखा गया कि फडकर न केवल जमकर बल्लेबाजी करते हैं बल्कि लिंडवाल और मिलर जैसे गेंदबाजों की बखिया उधेडऩे वाले शॉट खेलने से भी परहेज नहीं करते। गेंद को सीम और स्विंग कराने में माहिर फडकर अपनी दाएं हाथ की बल्लेबाजी से विकेट के चारों तरफ शॉट खेलते थे और आजकल के वनडे मैचों की तरह उस समय के टेस्ट मैचों में भी उनका गेंद को क्षेत्ररक्षक के सिर के ऊपर से उठाकर बड़ा शॉट खेलने के लिए मारना दर्शकों को ‘टुकटुक मार्का’ बल्लेबाजी के दौर में अलग ही अनुभूति देता था।

शीर्ष-3 बल्लेबाजों में थे पहली ही सीरीज में
फडकर ने अपनी पहली सीरीज में 4 टेस्ट मैचों में 314 रन बनाने में जहां 3 शानदार अद्र्धशतक और अपना पहला शतक लगाया, वहीं 8 विकेट चटकाकर अपनी मध्यम तेज गति गेंदबाजी से भी टीम को भरपूर सहयोग दिया। नतीजा 5 टेस्ट मैच की सीरीज में भारत ने 4 टेस्ट हारे, लेकिन 1 टेस्ट ड्रॉ कराने में वह सफल रहा, जो विशेषज्ञों ने भी एक गैरअनुभवी टीम की बड़ी सफलता माना। दत्तू फडकर इस दौरे पर भारतीय टीम की तरफ से टेस्ट मैचों में तीसरे सबसे सफल बल्लेबाज साबित हुए।

भारत की पहली टेस्ट जीत में भी दिया अहम योगदान
दत्तू फडकर के करियर में यदि भारतीय टीम की पहली टेस्ट जीत का जिक्र नहीं किया जाए तो यह शायद उस बेहतरीन ऑलराउंडर के साथ नाइंसाफी होगी। 1952 में मद्रास (अब चेन्नई) में इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज के 5वें टेस्ट को पंकज रॉय और पाली उमरीगर के शतकों तथा वीनू मांकड के 12 विकेटों के लिए ही याद किया जाता है। लेकिन टेस्ट के पहले ही ओवर में इंग्लिश ओपनर फ्रेंक लॉसन को पवेलियन लौटाकर जो झटका दिया, वो शायद इंग्लिश मनोबल को तोडऩे वाला साबित हुआ।

भारत की पहली पारी में उनकी 61 रन की बेहतरीन पारी ने ही पाली उमरीगर को अपने शतक के लिए बड़ी साझेदारी के जरिए आधार बनाने में मदद दी। फडकर के इन 61 रन की तारीफ उमरीगर ने भी बाद में कई बार अपने इंटरव्यू में की। आपको बता दें कि इस टेस्ट मैच में इंग्लैंड की गेंदबाजी की कमान फ्रेंक टायसन (जिन्हें उनकी तेजी के लिए टायफून भी कहा जाता था) और ब्रायन स्टेथम जैसे आला दर्जे के गेंदबाज संभाल रहे थे। टेस्ट मैच की दूसरी पारी में भी फडकर ने 191 रन से पिछड़ी इंग्लैंड का मनोबल एक बार फिर लॉसन को सिर्फ 7 रन पर आउट करते हुए स्कोर 2 विकेट पर 15 रन करते हुए तोड़ दिया था।

कोलकाता में खेली थी टेस्ट बचाने वाली पारी
कोलकाता के इडेन गार्डंस स्टेडियम को भले ही आजकल के क्रिकेटप्रेमी सबसे ज्यादा वीवीएस लक्ष्मण-राहुल द्रविड़ की साझेदारी और हरभजन सिंह की हैट्रिक के लिए याद रखते हों, लेकिन यह मैदान फडकर के भी सबसे बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन का साक्षी रहा है। यह प्रदर्शन भी 1951-52 की उसी सीरीज में आया था, जिसमें बाद में भारत ने अपना पहला टेस्ट मैच जीता था। कोलकाता में हुए सीरीज के तीसरे टेस्ट मैच में फडकर ने इंग्लैंड के 342 रन के सामने सिर्फ 144 रन पर पंकज रॉय, वीनू मांकड, लाला अमरनाथ, पाली उमरीगर, विजय हजारे जैसे बड़े बल्लेबाजों के विकेट खोकर संकट में फंसी भारतीय टीम को 115 रन की पारी खेलते हुए 344 रन के स्कोर पर पहुंचाया और 2 रन की मनोवैज्ञानिक बढ़त भी दिलाई। इस टेस्ट में फडकर ने इंग्लैंड के 4 अहम विकेट भी चटकाए थे। नतीजतन भारत यह टेस्ट ड्रॉ कराने में सफल रहा था।

2012 में याद किया बीसीसीआई ने
31 टेस्ट में 32.34 के औसत से 1229 रन बनाने वाले और 36.85 के औसत से 62 विकेट चटकाने वाले दत्तू फडकर के भारतीय क्रिकेट में योगदान को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने भी 2012 में सराहा था, जब उन्हें भी 7 अन्य महान क्रिकेटरों के साथ ‘भारतीय क्रिकेट में सबसे अहम योगदान’ के लिए विशेष बीसीसीआई अवॉर्ड मरणोपरांत दिया गया था। फडकर का साहस आज भी ऑस्ट्रेलिया में पहली बार खेल रहे किसी भी भारतीय क्रिकेटर के लिए प्रेरणा साबित हो सकता है।

टीम विश्व कप हारी पर भारतीय महिलाएं जीत गईं

कुलदीप पंवार
ये पढ़कर आप शायद हैरान हो रहे होंगे, लेकिन मेरी नजर में सच में भारतीय महिलाएं फाइनल हारकर भी जीत गईं। वे देश का महिला क्रिकेट में विश्वास जीत गईं। वे स्पांसरों का भरोसा जीत गईं। वे खुद में ये यकीन जीत गईं कि हम कुछ कर सकते हैं।

2005 से मत कीजिए तुलना इस हार की
इस हार की तुलना 2005 की फाइनल वाली हार से मत कीजिए, क्योंकि तब देश नहीं खड़ा था अपनी लाडो के पीछे। तब वो लहर भी नहीं थी, जो अब बनी है। तब छोटी बच्चियां ऐसे नहीं पहचानने लगी थीं महिला क्रिकेटरों को, जैसे अब हरमनप्रीत कौर, मिताली राज या स्मृति मंधाना को पहचानती हैं।

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बदल गए हैं अब दिन महिला क्रिकेट के

दो दिन पहले मैंने एक लेख पढ़ा था कि कैसे नाइकी के शोरूम में टीम इंडिया की जर्सी एक छोटी बच्ची ने पसंद की और उस पर खिलाड़ी का नाम लिखने को कहा। सेल्समैन ने धोनी या कोहली लिखवाने का सुझाव दिया तो बच्ची ने धीमे से जो नाम लिया वो सुनकर स्टोर के सभी कर्मचारी हैरान रह गए। वो नाम था मंधाना। क्या ये बदलाव 2005 का फाइनल ला सका था। जी नहीं, बिल्कुल नहीं।

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पुरुष क्रिकेट से भी तुलना नहीं
कुछ लोग इस फाइनल की हार की तुलना चैंपियंस ट्राॅफी फाइनल में पुरुषों की हार से कर रहे हैं। मैं कहूंगा मत कीजिए। पुरुषों की चैंपियंस ट्राॅफी के मुकाबले महिलाएं फिर भी फाइट करके हारीं। ये बड़े दबाव वाले मैचों के अनुभव की कमी थी, जो ये परिणाम आया। नहीं तो सभी जानते हैं कि 95% मैच में कौन हावी रहा।

Britain Cricket Womens World Cup

अब गेंद बीसीसीआई के पाले में है। इन लड़कियों को ज्यादा मैच खेलने के मौके दे। ज्यादा एक्सपोजर दे तो अगली बार परिणाम बदलेगा। देश में जो माहौल बना है, उसमें तो आईपीएल जैसी लीग भी महिलाओं के लिए फिलहाल कराएंगे तो जमकर स्पांसर भी मिल जाएंगे और दर्शक भी।

Britain Cricket Womens World Cup

हार के बीच ऐसे पाजिटिव रहा फाइनल
विश्व कप फाइनल की सबसे पाजिटिव बात ही मुझे ये लगी कि टीवी प्रसारण में पुरुषों के मैचों की तरह हर ओवर बाद विज्ञापनों की भरमार थी। दुनिया भ्रष्टाचार में 50 मिलियन दर्शकों से ज्यादा, वो भी महिला मैच में। भारत में 80% ज्यादा दर्शक। और क्या उदाहरण चाहिए, देश में महिलाओं के लिए बदले माहौल का। अब जरूरत अंतिम चोट की।

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मानता हूं कि विश्व कप आ जाता तो निश्चित ही वो क्रांति हो जाती महिला क्रिकेट में, जो 1983 ने पुरुषों के लिए की। लेकिन यकीन मानिए, अब भी कम नहीं है। बाजार तैयार है, बस जरूरत थोड़े इन्वेस्टमेंट की है, जो बीसीसीआई को करना चाहिए। इन लड़कियों को मैदान चाहिए, बाकी धूम तो वे खुद ही मचा लेंगी।

(लेखक राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र में खेल संपादक हैं। यदि आपको आगे भी उनके ऐसे लेख पढ़ने हैं तो आप हमारी इस ब्लॉग साइट को FOLLOW कर सकते हैं।)

 

 

संन्यास विशेष: सिर्फ क्रिकेटर नहीं क्रिकेट की सबसे बड़ी किताब थे सुनील गावस्कर – Sunil Gavaskar, Not Only A Cricketer, He Was BOOK OF CRICKET

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नई दिल्ली। 17 मार्च ही वो तारीख थी 1987 के साल में, जब क्रिकेट की सबसे बड़ी किताब में आखिरी चैप्टर भी लिख लिया गया। ये किताब थी महान सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर के क्रिकेट करियर की।

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एक ऐसा बल्लेबाज, जिससे वेस्टइंडीज की वो पेस चौकड़ी भी घबराती थी, जिसके सामने पूरी दुनिया के बल्लेबाजों के पैर कांपते थे। आखिर घबराती भी क्यूं नहीं, जब सभी बल्लेबाज खुद को कैरेबियन पेस के सामने हेल्मेट में छिपाने या बल्लेबाजी क्रम में नीचे उतारकर बचने का जुगाड़ तलाशते थे, तब छोटे से कद के गावस्कर ही थे, जो गोल हैट लगाए नई गेंद के सामने नमी से भरी पिचों पर भी आसानी से उन खतरनाक गेंदबाजों को एक के बाद एक शाॅट खेलकर ठेंगा दिखाते रहते थे।

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10000 टेस्ट रन, डेढ़ दशक तक 34 शतक के साथ नंबर वन, ये तो सिर्फ चंद आंकड़े थे, सनी (साथियों में इसी नाम से प्रसिद्ध थे गावस्कर) के करियर में। वो क्या करने वाले हैं इसकी झलक पहली ही टेस्ट सीरीज में वेस्टइंडीज के ही खिलाफ 4 टेस्ट में एक के बाद एक दनादन रन बनाते हुए 774 रन ठोंककर दिखा दी थी उन्होंने। डेब्यू सीरीज का यह रिकॉर्ड आज तक नहीं तोड़ा जा सका है। यही साहस था, जिसने भारत को कैरेबियाई धरती पर पहली बार जीत हासिल करने का जोश दिया।

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एक-एक शाॅट क्रिकेट की किताब में दिए गए तरीकों पर परफेक्शन की कतार में खरा उतरता हुआ, ये खासियत थी सनी की बल्लेबाजी की और शायद यही कारण था कि उन्हें खुद क्रिकेट की चलती-फिरती किताब कहा जाता था। पिच पर फुटवर्क का खूबसूरत अहसास लेना हो तो सनीचर की बल्लेबाजी से बढ़कर शायद कुछ हो ही नहीं सकता था। एक तत्कालीन मशहूर कमेंटेटर ने कहा भी था कि गावस्कर की बल्लेबाजी के बाद पिच को देखिए, फुटवर्क के निशान ऐसे दिखेंगे मानो कोई चिड़िया इधर-उधर फुदकती रही हो।

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गेंदबाज को जवाब कैसे दिया जाए, यह भी सनी बखूबी जानते थे। जहां आज गेंदबाज-बल्लेबाज स्लेजिंग में उलझ जाते हैं वहीं सुनील ने 1983 में भारत आई वेस्टइंडीज के सबसे खौफनाक गेंदबाज मैल्कम मार्शल की गेंद पर बल्ला हाथ से छूट जाने का बदला दनादन चौकों से लिया था।

जिस बल्लेबाज पर अपने पहले वनडे विश्वकप में पहली बार सीमित ओवर मैच खेलने पर 60 ओवर बल्लेबाजी कर सिर्फ 36 नॉटआउट रन बनाने के बाद टेस्ट बल्लेबाज होने का ठप्पा लगा दिया गया हो, उन विशेषज्ञों को भी कैसा करारा जवाब दिया था सनी ने करियर के आखिरी विश्व कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ धुआंधार तरीके से अपना वनडे का एकमात्र शतक लगाते हुए।

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बेंगलूरु में करियर के आखिरी टेस्ट में भी उन्होंने पाकिस्तान की दबावभरी गेंदबाजी के सामने जो 96 रन बनाए थे, उसे उनकी सबसे बेहतरीन पारी में गिना गया। एक बल्लेबाज के लिए इससे बड़ी बात शायद कुछ नहीं हो सकती कि उसके संन्यास लेने पर पूछा जाए कि अभी क्यूं, थोड़े दिन और खेल सकते हैं अभी तो…..लेकिन वो गावस्कर थे, जो हमेशा मिसाल कायम करने के लिए मशहूर रहे।
क्रिकेट पिच छोड़ने के बाद कमेंट्री बाक्स में भी मशहूर होने वाले चंद ही क्रिकेटर रहे हैं और सनी उनमें भी अव्वल हैं। यहां भी ऐसा कि कमेंट्री में की गई आलोचना को गुरु ज्ञान मानकर तवज्जो दी जाए तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं उनकी महानता का।

पुण्यतिथि विशेष : देश के पहले असली ऑलराउंडर थे दत्तू फडकर – Dattu Phadkar, First Real Allrounder Of Indian Cricket

पुण्यतिथि विशेष : देश के पहले असली ऑलराउंडर थे दत्तू फडकर – Dattu Phadkar, First Real Allrounder Of Indian Cricket

Source: पुण्यतिथि विशेष : देश के पहले असली ऑलराउंडर थे दत्तू फडकर – Dattu Phadkar, First Real Allrounder Of Indian Cricket

140 साल का हुआ टेस्ट क्रिकेट पर बढ़ रही है अस्तित्व की चिंता

नई दिल्ली। ठीक 140 साल पहले 15 मार्च 1877 वो तारीख थी, जब पहली बार उस ‘महामारी’ को अधिकारिक दर्जा मिला, जिसने लगभग पूरी दुनिया को धीरे-धीरे अपनी चपेट में ले लिया। यह महामारी थी क्रिकेट देखने और खेलने की। भले ही यह कहा जाए कि आज भी दुनिया में फुटबॉल और हॉकी के मुकाबले क्रिकेट खेलने वाले देशों की संख्या कम है, लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि क्रिकेट इस समय तेजी से लोकप्रिय होता खेल है और कई फुटबॉल खेलने वाले देशों में भी इसका क्रेज तेजी से बढ़ाहै।

ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच मेलबर्न में 19 मार्च, 1877 तक चले पहले ऐतिहासिक अधिकारिक टेस्ट मैच में मेजबान ऑस्ट्रेलिया ने 45 रनों से जीत दर्ज की थी। तब से आज तक हर दिन क्रिकेट की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से ऊपर की तरफ ही चढ़ा है। यहां तक कि इसके भी तमाम तरह के नए-नए संस्करण सामने आ गए, जिनके चलते क्रिकेट प्रेमियों को भी अपनी सुविधानुसार इस खेल से जुडऩे का मौका बढ़ता चला गया। लेकिन साथ ही बढ़ती जा रही हैं इस खेल के सबसे पुराने संस्करण यानि टेस्ट क्रिकेट के लिए चुनौतियां भीं। हर मिनट में तेजी से बदल रही दुनिया में युवा पीढ़ी पांचबा दिन तक स्टेडियम में बैठकर टेस्ट मैच देखने का मिजाज खोती जा रही है। इसमें कोढ़ में खाज सरीखे साबित हो रहे हैं बोरियत से भरे ड्रॉ होते टेस्ट मैच। ऐसे में जरूरत महसूस की जा रही है, इस संस्करण को तमाम तरीकों से रोचक बनाने की।

इतना लंबा हो गया है टेस्ट क्रिकेट का सफर
140 साल लंबे टेस्ट क्रिकेट के सफर में इसके दो संस्करण पैदा हुए। पहला वनडे क्रिकेट और दूसरा टी20 क्रिकेट। वनडे क्रिकेट आज 46 साल 2 महीने और 10 दिन का है, जबक टी20 क्रिकेट किसी अबोध बच्चे जैसा 12 साल 26 दिन का। लेकिन जैसा हुआ करता है, हर घर में बूढ़े के मुकाबले बच्चे को प्राथमिकता मिलने की परंपरा क्रिकेट के इन संस्करणों पर भी लागू होती हैं और आज की तारीख में लोकप्रियता के पैमाने पर फटाफट क्रिकेट का सबसे छोटा संस्करण यानि टी20 क्रिकेट अन्य दोनों के लिए खतरा साबित हो रहा है। 2253 टेस्ट मैच के सफर में 3849 वनडे और 601 टी20 मैचों का नजारा क्रिकेट प्रेमी देख चुके हैं। लेकिन दर्शकों की घटती संख्या का नजारा यदि किसी एक संस्करण में दिखाई दे रहा है तो वह है टेस्ट क्रिकेट में और इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, साल दर साल घटती मैचों की संख्या के तौर पर।

असली परीक्षा लेता है टेस्ट क्रिकेट
भले ही कम समय में ज्यादा मजा देने के नाम पर टी20 क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ रही हो और लंबी हिट लगती देखकर गेंदबाजों के माथे पर बहते पसीने को देखकर ही युवा दर्शक खुश होने लगे हों, लेकिन यह नितांत सत्य है कि आज भी किसी बल्लेबाज के टेलेंट का असली पैमाना टेस्ट क्रिकेट ही है। टेस्ट क्रिकेट में पांच दिन के खेल के दौरान ही परखा जा सकता है कि कोई बल्लेबाज कितना बड़ा प्रतिभावान है और किसी गेंदबाज के अंदर गेंदों में चतुराई भरने की कला कितनी कूट-कूट कर भरी है।

Could there be bigger totals in Tests in four years? Have bowlers exhausted all the ways to keep batsmen in check?

आप ही बताइए यदि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया-भारत के बीच खत्म हुए पुणे और बेंगलूरु टेस्ट मैचों को ही पैमाना बनाया जाए तो गेंद और बल्ले के बीच जूझने के रोमांच का ऐसा लुत्फ क्या किसी टी20 मैच में उठाया जा सकता है। यह टेस्ट क्रिकेट में ही संभव है कि स्टीव ओकीफे सरीखे स्पिनर की गेंद मिडिल स्टंप पर ठप्पा खाने के बाद ऐसा घुमाव ले कि सीधी स्लिप में खड़े कप्तान स्टीव स्मिथ के हाथ में पहुंच जाए या फिर नाथन लियोन की गेंद ठप्पा खाने के बाद ऐसा उछाल ले कि चेतेश्वर पुजारा जैसा तकनीक का धनी बल्लेबाज भी चकित होकर फॉरवर्ड शॉटलेग पर खड़े फील्डर के हाथों में कैच थमा दे। आर. अश्विन की हवा में फ्लाइट लेती गेंद पर स्ट्रोक खेलने के प्रयास में चकमा खाकर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज विकेट गंवा दे। तेज गेंदबाजों की पुरानी गेंद से भी उल्टी दिशा में होती लंबी-लंबी रिवर्स स्विंग बल्लेबाज के चेहरे पर वही बदहवासी पैदा कर दे, जो नई गेंद पैदा करती है। आप भी जानते हैं कि ये कमाल किसी भी 20 ओवर के मैच में संभव नहीं है बल्कि पांच दिन तक हर घंटे अपना रंग बदलने वाली पिच पर ही ऐसा नजारा देखने को मिल सकता है।

क्या कभी भूली जा सकती हैं ये पारियां
फटाफट क्रिकेट के दौर में रोजाना लंबी-लंबी हिट से भरी पारियां खेली जाती हैं और चंद दिन की वाहवाही के बाद दर्शक भी उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन टेस्ट क्रिकेट में गेंद-बल्ले की तगड़ी जद्दोजहद के बीच खेली जाने वाली पारियां दशकों तक दर्शकों को ऐसे ही याद रहती हैं, मानो कल खेली गई थीं। इसका कारण है उन पारियों में तकनीक की पराकाष्ठा का दर्शनीय नजारा। डॉन ब्रैडमैन की पारियों के वीडियो आज भी दर्शकों को लुभाते हैं तो गैरी सोबर्स की 365 रन की पारी देखने का आकर्षण भी अनोखा रहता है।

ब्रायन लारा के 401 रन, 375 रन हों या फिर सुनील गावस्कर के अपनी पहली टेस्ट सीरीज में वेस्टइंडीज की आंखें बंद करा देने वाली पेस चौकड़ी की गेंदों पर लगाए गए शतक आज भी अविस्मरणीय कहे जा सकते हैं। इयान बॉथम के एशेज सीरीज में और भारत के खिलाफ दिखाए गए ऑलराउंड प्रदर्शन को भुलाना शायद ही संभव है और इतना ही असंभव है भारत की स्पिन चौकड़ी और उनसे भी पहले वीनू मांकड का अपनी घूमती गेंदों पर बल्लेबाज की आंखों में कैरेबियाई तेज गेंदबाजों की गेंदों की तरह चारों तरफ घिरे करीबी फील्डरों को लेकर दिखता खौफ भूल पाना। शायद ही कोई सचिन तेंदुलकर की 1993 में पर्थ टेस्ट की 114 रन की पारी और 1999 में चेन्नई टेस्ट में पाकिस्तान के खिलाफ 116 रन की पारी भूल पाएगा। कोई भी विशेषज्ञ विरेंदर सहवाग की खौफजदा करने वाली वनडे पारियों से भी पहले हमेशा आपको उनके तिहरे शतकों की बात ही करता दिखाई देगा। सुनील गावस्कर की अंतिम टेस्ट पारी में बेंगलूरु में पाकिस्तान के खिलाफ खेली गई नर्वस नाइंटी को उनके 35 शतकों से भी ज्यादा तवज्जो मिलने का कारण भी टेस्ट क्रिकेट में तकनीक की पराकाष्ठा ही कारण रही होगी।

फटाफट क्रिकेट की होड़ में घटते जा रहे टेस्ट मैच
फटाफट क्रिकेट को लेकर बढ़ते के्रेज के बीच टेस्ट क्रिकेट के आयोजन का नजारा घटता ही जा रहा है। पिछले 10 साल को आधार माना जाए तो इस दौरान जहां सिर्फ 424 टेस्ट मैच आयोजित किए गए, वहीं 1317 वनडे और 587 टी20 मैचों का आयोजन सारी दुनिया में किया गया। इसका कारण प्रायोजकों की घटती रूचि को भी बताया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा कारण है क्रिकेट बोर्डों की कम टेंशन में फटाफट क्रिकेट से ज्यादा कमाई करने की कोशिश। ऐसे में अगले कुछ साल में टेस्ट क्रिकेट सिर्फ परंपरा के लिए एक-आध मैच तक ही सिमटकर ना रह जाए तो भी कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी।

अब कुछ बात दुनिया के पहले टेस्ट मैच की
पहले टेस्ट मैच में कोई समय सीमा नहीं थी, इसमें दोनों टीमों ने दो-दो पारियां खेली। ये टेस्ट मैच चार दिनों तक चला था। पहले के वक्त में यही हुआ करता था, चाहे कितने दिन लगे दोनों टीम को दो-दो पारियां खेलनी होती थी। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान जैक ग्रेगरी ने टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाजी की थी और पहली पारी में 245 रनों का स्कोर खड़ा किया था। इन रनों में अकेले ही ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज बैनरमैन ने 165 रनों की शतकीय पारी खेली थी, जोकि टेस्ट इतिहास का पहला शतक भी था।

बैनरमैन के खाते में ही टेस्ट क्रिकेट का पहला रन बनाने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। इसके अलावा उनके नाम एक और रिकॉर्ड दर्ज है, जो आज तक नहीं तोड़ा जा सका। यह रिकॉर्ड है किसी टीम की पारी में एक बल्लेबाज के सबसे ज्यादा प्रतिशत योगदान का। बैनरमैन की 165 रन की पारी ऑस्ट्रेलिया के पहली पारी के 245 रन के स्कोर का 67.3 त्न था,जो आज तक टेस्ट क्रिकेट में किसी अन्य बल्लेबाज की पारी से नहीं टूटा है।

इसके जवाब में इंग्लैंड पहली पारी में 196 रन पर ही लुढ़क गया। इंग्लैंड की पारी में भी उनके सलामी बल्लेबाज हैरी जुप्प ने 63 रन की पारी खेलते हुए टेस्ट क्रिकेट का पहला अर्धशतक बनाया। दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया की टीम सिर्फ 104 रनों पर सिमट गई। इस तरह इंग्लैंड की टीम के सामने 153 रनों का लक्ष्य था। लेकिन पूरी टीम सिर्फ 108 रन बनाकर आउट हो गई और इस तरह पहले टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया 45 रनों से जीत गई।

इंग्लैंड के गेंदबाज ने फेंकी थी टेस्ट क्रिकेट इतिहास की पहली गेंद
्रइंग्लैंड के मध्यम तेज गति के गेंदबाज अल्फे्रड शॉ ने टेस्ट इतिहास की पहली गेंद फेंकी थी। शॉ ने अपने पहले ही मैच में शानदार गेंदबाजी करते हुए पहली पारी में 3 और दूसरी पारी में 5 विकेट लेकर मैच में कुल 8 विकेट झटके थे। हालांकि टेस्ट क्रिकेट में पहली बार पारी में 5 विकेट लेने का श्रेय अल्फ्रेड शॉ के खाते में नहीं आया बल्कि यह कारनामा इंग्लैंड की पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया के मध्यमतेज गति के गेंदबाज बिली मिडविंटर ने 5 विकेट 78 रन पर चटकाकर किया था। मिडविंटर की खास बात यह थी कि वह ऑस्ट्रेलिया और उसके बाद इंग्लैंड यानि दोनों देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेस्ट क्रिकेट खेले और ऐसा करने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने थे।

क्रिकेट कमेंट्री में फिर सुनाई देगी ‘समय’ की आवाज – Harsha Bhogle Will Be Back In Commentary Box With IPL-10

नई दिल्ली। आप लोगों में से जो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं, उन्हें बीआर चोपड़ा का धारावाहिक महाभारत अवश्य याद होगा। साथ ही याद होगी इस धारावाहिक को शुरू करने के लिए शुरुआत में आने वाली वो आवाज जो कहती थी, मैं समय हूं। हर दर्शक का सबसे पहला जुड़ाव इसी आवाज के साथ होता था। ना किसी ने देखा और ना किसी ने जाना, लेकिन महाभारत और दर्शकों के बीच की कड़ी बन चुकी थी ये आवाज। कुछ ऐसा ही जुड़ाव क्रिकेट के मैदान पर भी एक आवाज के साथ दर्शकों का बन चुका है। ये आवाज आती हैं कमेंट्री बॉक्स से और कभी-कभी मैच खत्म होने के बाद समापन समारोह के दौरान। ये आवाज है हर्षा भोगले की।

हर्षा ना तो कोई पुराने क्रिकेटर हैं और ना ही क्रिकेट से उनका अंपायर या किसी अन्य तरीके से कोई नाता है। लेकिन शौकिया क्रिकेट कमेंट्री शुरू करने के बाद उन्होंने खेल से जुड़ी इस विधा को वैसी ही अनोखी ऊंचाइयां दीं, जैसी कभी नरोत्तम पुरी और कई अन्य पुराने कमेंटेटरों ने रेडियो कमेंट्री को दी थी।

बल्लेबाज हो या गेंदबाज या फिर मैदान पर खड़ा कोई फील्डर, जिस अनोखे अंदाज में उसके खेल का विश्लेषण हर्षा कमेंट्री बॉक्स में करते रहे, उससे कई बार उनके साथ कमेंट्री करने वाले विशेषज्ञ क्रिकेटरों को भी हैरानी का सामना करना पड़ा। कई क्रिकेटर अपने करियर में स्वीकार चुके कि उनके खेल में मामूली गलती असफलता का सबब बन रही थी और हर्षा की कमेंट्री में वो कमी सामने आने पर उन्होंने उसे ठीक करते हुए फिर से अपना स्टारडम वापस लौटा लिया।

<blockquote class=”twitter-tweet” data-lang=”en”><p lang=”en” dir=”ltr”>It has been 11 years since THAT 434-438. <a href=”https://twitter.com/bhogleharsha”>@bhogleharsha</a&gt; revisits one of the greatest ODIs ever. FULL VIDEO: <a href=”https://t.co/4skzfdFoQy”>https://t.co/4skzfdFoQy</a&gt; <a href=”https://t.co/VynoDFlFkn”>pic.twitter.com/VynoDFlFkn</a></p>&mdash; Cricbuzz (@cricbuzz) <a href=”https://twitter.com/cricbuzz/status/840797608641744896″>March 12, 2017</a></blockquote>
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ऐसे करिश्माई कमेंटेटर की कमेंट्री से दर्शकों को पिछले लंबे अरसे से महरूम होना पड़ा और वो भी सिर्फ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अहंकार के कारण। अपनी कमेंट्री में कभी किसी की गलती पर आलोचना करने से नहीं चूके हर्षा ने बीसीसीआई की कमियों पर प्रकाश डाला और नतीजतन उन्हें मैचों के लिए चुने जाने वाले कमेंट्री पैनल से बाहर का रास्ता देखना पड़ा, जिसे बीसीसीआई का अपू्रवल मिलना आवश्यक होता है। हालांकि इस बात को ना तो कभी अधिकारिक रूप से बीसीसीआई अधिकारी स्वीकारेंगे और ना ही विवादों से दूर रहने वाले हर्षा ही नया विवाद शुरू करना चाहेंगे। लेकिन यह सच है कि अपने क्रिकेट ज्ञान से बड़े-बड़े क्रिकेट पंडितों की बोलती बंद करा देने वाले हर्षा भोगले की कमेंट्री सुनने का लुत्फ पिछले लंबे समय से टीवी दर्शक नहीं उठा पाए।

अब क्रिकेट कमेंट्री का यह खालीपन दूर होने वाला है। हर्षा भोगले का वनवास खत्म हो गया है। वो दोबारा स्टेडियम के कमेंट्री बॉक्स में बैठकर कमेंट करते दिखाई देंगे। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, हर्षा भोगले आईपीएल के 10वें संस्करण के साथ एक बार फिर टीवी कमेंट्री की दुनिया में वापसी करेंगे। बता दें कि आईपीएल-9 में ही हर्षा को कमेंट्री टीम से बाहर किया गया था, जबकि कई सर्वे में वह आईपीएल के पहले 8 संस्करण के सबसे मशहूर कमेंटेटर चुने गए थे। इस रिपोर्ट के अनुसार, हर्षा के सामने दो विकल्प मौजूद हैं। पहला वो मैदान पर कमेंटेटर के तौर पर मौजूद रहेंगे और दूसरा, जिसे वह ज्यादा पसंद करते हैं, स्टूडियो में बैठकर मैच का प्री और पोस्ट शो होस्ट करना।

पिछले साल मार्च-अप्रैल में हुए विश्व टी20 टूर्नामेंट के दौरान कमेंट्री बॉक्स में दिखे भोगले के खिलाफ बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के एक ट्वीट से विवाद शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक भारतीय कमेंटेटर विदेशी खिलाडिय़ों की बजाय अपने क्रिकेटरों पर कमेंट करना ज्यादा पसंद करते हैं। अमिताभ के इस ट्वीट को तत्कालीन भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने रिट्वीट किया था, जिसे बाद में तत्कालीन उपकप्तान विराट कोहली व मुरली विजय ने भी फॉलो किया था। माना जाता है कि यही विवाद भोगले के कमेंट्री बॉक्स से बाहर जाने का कारण बना था।

<blockquote class=”twitter-tweet” data-lang=”en”><p lang=”en” dir=”ltr”>T 2184 – With all due respects, it would be really worthy of an Indian commentator to speak more about our players than others all the time.</p>&mdash; Amitabh Bachchan (@SrBachchan) <a href=”https://twitter.com/SrBachchan/status/712721409420578816″>March 23, 2016</a></blockquote>
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अब उस समय के बीसीसीआई पदाधिकारियों का पॉवरगेम से बाहर होना और आईपीएल के लिए पाकिस्तानी कमेंटेटरों रमीज राजा, शोएब अख्तर, वकार यूनुस आदि के कमेंट्री टीम में शामिल होने के आड़े भारत-पाक संंबंध आने आदि वो कारण हैं, जिसके चलते हर्षा भोगले को वापस लाने के लिए टीवी चैनल को भी मजबूर होना पड़ा है। ऐसे में दर्शकों को जहां एक बार फिर स्पष्ट और बिना चाटुकारिता वाली कमेंट्री सुनने का मौका मिलने की उम्मीद है, वहीं पुराने क्रिकेटरों के किस्से सुनने तक सीमित रह गई कमेंट्री में नयापन आने की भी आस क्रिकेटप्रेमियों को बंध जाएगी।

 

ऑल इंग्लैंड ओपन में जो नहीं हुआ वो अब इंडिया ओपन में है संभव, क्वार्टर फाइनल में भिड़ सकती हैं सिंधु-साइना – Pv Sindhu And Saina Nehwal Fight Can Be Possible In India Open

नई दिल्ली। रियो ओलंपिक की रजत विजेता पीवी सिंधु और पूर्व नंबर एक साइना नेहवाल ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप के अंतिम-8 में हारने के कारण सेमीफाइनल में आपस में नहीं भिड़ पाईं, लेकिन देश की इन दोनों दिग्गज खिलाडिय़ों के बीच 28 मार्च से दो अप्रैल तक खेले जाने वाले इंडिया ओपन सुपर सीरीज टूर्नामेंट के क्वार्टरफाइनल में आमना-सामना हो सकता है।

बीडब्ल्यूएफ मेटलाइफ योनेक्स सनराइज सुपर सीरीज इंडिया ओपन टूर्नामेंट दिल्ली के सीरी फोर्ट स्टेडियम में 28 मार्च से दो अप्रैल तक खेला जाएगा। सिंधु और साइना दोनों को टूर्नामेंट के दूसरे हाफ में रखा गया है, जिससे दोनों की क्वार्टर फाइनल में भिड़ंत हो सकती है।

Photo published for Saina Nehwal, PV Sindhu suffer loss at All England quarter-final: As it happened

तीन बार इंडिया ओपन चैंपियन रहीं हैं साइना
सिंधु और साइना हाल में समाप्त हुई ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप के क्वार्टरफाइनल में हार गईं थीं। यदि ये दोनों खिलाड़ी जीत जातीं तो उनके बीच सेमीफाइनल में मुकाबला होना तय था। साइना इंडिया ओपन मे 2010 और 2015 में विजेता रह चुकी हैं, जबकि सिंधु को अपने पहले इंडिया ओपन खिताब की तलाश है। सिंधु को इंडिया ओपन में तीसरी वरीयता और साइना को छठी वरीयता मिली है। सिंधु का पहला मुकाबला सिंगापुर की जियाओयू लियांग से होगा, जबकि साइना की भिड़ंत ताइपे की चिया सिन ली से होगी।

मारिन और ली चोंग को शीर्ष वरीयता
टूर्नामेंट के महिला एकल वर्ग में विश्व और ओलंपिक चैंपियन स्पेन की कैरोलिना मारिन को शीर्ष वरीयता मिली है। कोरिया की सुंग जी ह्यून को दूसरी और जापान की अकाने यामागूची को चौथी वरीयता दी गई है। ऑल इंग्लैंड में चौथी बार पुरुष खिताब जीतने वाले मलेशिया के ली चोंग वेई को पुरुष वर्ग में शीर्ष वरीयता दी गई है। डेनमार्क के जॉन ओ जोर्गेनसन को दूसरी और डेनमार्क के ही विक्टर एक्सेलसन को तीसरी वरीयता मिली है।

पुरुषों में इन भारतीयों पर भी निगाहें
भारतीयों में पुरुष एकल के मुख्य ड्रॉ में बी. साई प्रणीत, समीर वर्मा, किदाम्बी श्रीकांत, अजय जयराम और एचएस प्रणय को जगह मिली है। श्रीकांत हाल में जर्मन ओपन के क्वार्टर फाइनल में पहुंचे थे, जबकि प्रणय ऑल इंग्लैंड के दूसरेे दौर में हारे थे। जयराम की चुनौती पहले दौर में ही टूट गई थी। प्रणीत का पहला मुकाबला क्वालिफायर से, समीर का चौथी वरीयता प्राप्त कोरिया के सोन वान हो से, श्रीकांत का क्वालिफायर से और जयराम का विक्टर से मुकाबला होगा।

महिलाओं में रहेंगी ये भारतीय
महिला एकल में रितुपर्णा दास ताइपे की चियांग मेई हुई से, तन्वी लाड सातवीं सीड जापान की नोजोमी ओकूहारा से और श्रीकृष्णा प्रिया दूसरी सीड सुंग जी से भिड़ेंगी। मिश्रित युगल में प्रणव चोपड़ा और एन. सिक्की रेड्डी की जोड़ी को सातवीं वरीयता मिली है। पुरुष युगल में मनु अत्री और बी. सुमित रेड्डी तथा महिला युगल में अश्विनी पोनप्पा और एन. सिक्की रेड्डी से भी उम्मीदें रहेंगी।

इंजमाम या मिस्बाह नहीं इस पाकिस्तानी क्रिकेटर का आदर्श हैं विराट कोहली- Pakistani Cricketer Babar Azam Wants To Play Like Virat Kohli

लाहौर। पाकिस्तान के युवा प्रतिभाशाली बल्लेबाज बाबर आ•ाम ने कहा कि वह भारतीय कप्तान विराट कोहली के शानदार खेल से प्रेरित हैं और वह उन्हीं की तरह सफलता के शिखर पर पहुंचना चाहते हैं।

वेस्टइंडीज के खिलाफ आगामी वनडे सीरीज की तैयारियों में जुटे आजम ने यहां अभ्यास शिविर में संवाददाताओं से कहा, विराट और मेरी खेल शैली अलग-अलग है। हम दोनों अलग-अलग तरीके से बल्लेबाजी करते हैं, लेकिन मैं उनसे बहुत ज्यादा प्रेरित हूं। जिस तरह वह शानदार बल्लेबाजी कर टीम की जीत में योगदान दे रहे हैं, मैं भी उन्हीं की तरह सफलता के शिखर तक पहुंचना तथा टीम की जीत में योगदान देना चाहता हूं।

आजम ने कहा, मैं अपनी टीम के लिए हमेशा मैच विजयी प्रदर्शन करना चाहता हूं और ज्यादा से ज्यादा रन बनाना चाहता हूं। मुझे अभी करियर में लंबा सफर तय करना है, लेकिन मैं सही दिशा में आगे बढऩा चाहता हूं। उल्लेखनीय है कि 22 वर्षीय आजम ने पदार्पण के बाद से 23 वनडे मैचों में 53 के प्रभावशाली औसत के अलावा चार ट््वंटी-20 मैचों में 116 के प्रभावशाली औसत से रन बनाए हैं। उनकी बल्लेबाजी को देखते हुए पाकिस्तानी कोच मिकी आर्थर ने उनकी तुलना विराट से की थी।

आईपीएल के लिए इस ट्रॉफी में भारतीय टीम की कोचिंग छोड़ देंगे राहुल द्रविड़- Rahul Dravid Will Leave Indian Team Coaching For IPL

नई दिल्ली। देश की सभी जूनियर क्रिकेट टीमों के कोच और पूर्व महान बल्लेबाज राहुल द्रविड़ इस महीने के अंत में अंडर-23 टीम को कोचिंग नहीं देंगे। यह टीम एशियन क्रिकेट काउंसिल की एमर्जिंग ट्रॉफी में भाग लेने के लिए बांग्लादेश जाएगी, जहां 25 मार्च से 5 अप्रैल तक टूर्नामेंट का आयोजन होगा।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इस दौरान पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ को राष्ट्रीय अंडर-23 टीम की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए अपनी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) फ्रेंचाइजी दिल्ली डेयरडेविल्स से जुडऩे की अनुमति दे दी है। इसके चलते दिल्ली डेयरडेविल्स के कोच राहुल द्रविड़ टीम के साथ 28 मार्च से राजधानी दिल्ली में शुरू हो रहे ट्रेनिंग कैंप में जुड़ पाएंगे। द्रविड़ की जगह टीम के साथ नेशनल क्रिकेट एकेडमी के कोच और पूर्व भारतीय क्रिकेटर डब्ल्यूवी रामन व नरेंद्र हिरवानी को मिलने के संकेत एक बीसीसीआई सूत्र ने दिए हैं।

बता दें कि द्रविड़ का बीसीसीआई के साथ कोचिंग कांट्रेक्ट 31 मार्च को खत्म हो रहा है, जबकि एमर्जिंग ट्रॉफी का आयोजन 5 अप्रैल तक होना है। ऐसे में द्रविड़ नैतिक तौर पर भी अपनी आईपीएल टीम के साथ जुडऩे के लिए स्वतंत्र थे। बीसीसीआई की तरफ से अप्रैल और मई के महीने में कोचिंग स्टाफ के सदस्य अपनी सेवाएं आईपीएल फ्रेंचाइजी को देने के लिए स्वतंत्र हैं।

5 अप्रैल से शुरू हो रही आईपीएल के लिए बीसीसीआई पहले ही सभी अंडर-23 क्रिकेटरों को एमर्जिंग ट्रॉफी से छूट दे चुका है और ऐसे में वहां पर बिल्कुल नए चेहरों को मौका मिलने की उम्मीद है। इनमें सबसे ज्यादा निगाहें 17 साल के पृथ्वी शॉ, अभिमन्यु ईश्वरन और मयंक डागर जैसे अगली पीढ़ी का भविष्य माने जा रहे क्रिकेटरों पर होंगी, जिन्हें अभी आईपीएल फ्रेंचाइजी का साथ नहीं मिला है।